स्पेन के खगोलजीवविज्ञान केंद्र के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने येबेस के 40-मीटर और IRAM के 30-मीटर रेडियो दूरबीनों से आकाशगंगा केंद्र के पास स्थित आणविक बादल G+0.693−0.027 में पहली बार अंतरतारकीय माध्यम में एरिथ्रुलोज़ का पता लगाया। चार कार्बन वाला यह मोनोसैकराइड ठंडी अंतरतारकीय धूल पर सरल अणुओं से बन सकता है। यह खोज इस विचार का समर्थन करती है कि शर्कराएँ क्षुद्रग्रहों या धूमकेतुओं के जरिए युवा ग्रहों तक पहुँच सकती हैं, लेकिन यह सिद्ध नहीं करती कि पृथ्वी का जीवन अंतरिक्ष से आया था।
मुख्य बातें
- यह अंतरतारकीय माध्यम में किसी शर्करा की पहली पुष्टि है और इस वातावरण में चार-कार्बन वाली शर्करा एरिथ्रुलोज़ की भी पहली खोज है।
- दल ने वर्णक्रमीय रेखाओं के 12 समूहों में 17 संक्रमण पहचाने। इनमें से 6 समूह अन्य अणुओं के हस्तक्षेप से काफी हद तक मुक्त थे और संयोगवश मेल बैठने की अनुमानित संभावना 0.2% थी।
- एरिथ्रुलोज़ की प्रचुरता, न मिली तीन-कार्बन वाली शर्कराओं की ऊपरी सीमाओं से कम-से-कम 8 से 17 गुना अधिक थी। इससे संकेत मिलता है कि अंतरतारकीय शर्कराएँ केवल एक-एक कार्बन परमाणु जोड़कर नहीं बनतीं।
- रासायनिक मॉडल बताते हैं कि यह ठंडी अंतरतारकीय धूल के कणों पर सरल दो-कार्बन एल्डिहाइड और अल्कोहल से बन सकती है।
- अध्ययन इस संभावना का समर्थन करता है कि अंतरिक्षीय पिंड जीवन-पूर्व घटक पहुँचा सकते हैं, लेकिन यह सिद्ध नहीं करता कि जीवन या पृथ्वी का जीवन सीधे अंतरिक्ष से आया।
आकाशगंगा केंद्र के पास गैस और धूल के एक बादल में, पृथ्वी से लगभग 8.2 किलोपारसेक (करीब 26,700 प्रकाश-वर्ष) दूर, खगोलविदों ने पहली बार अंतरतारकीय माध्यम में किसी वास्तविक शर्करा अणु की पुष्टि की है। दल ने आणविक बादल G+0.693−0.027 में एरिथ्रुलोज़ की रेडियो-वर्णक्रमीय पहचान पाई। एरिथ्रुलोज़ चार कार्बन वाला कीटोज़ है, जो रसभरी जैसे फलों में बहुत कम मात्रा में मिलता है और कुछ कृत्रिम टैनिंग सौंदर्य प्रसाधनों में भी इस्तेमाल होता है।
हजारों प्रकाश-वर्ष दूर किसी शर्करा को कैसे पहचाना जाता है?
घूर्णन करते समय अणु खास आवृत्तियों पर रेडियो तरंगें उत्सर्जित या अवशोषित करते हैं, जिससे एक विशिष्ट वर्णक्रमीय छाप बनती है। दल ने स्पेन की येबेस वेधशाला की 40-मीटर दूरबीन और IRAM की 30-मीटर दूरबीन से 91 GHz से अधिक दायरे का अत्यधिक संवेदनशील वर्णक्रम प्राप्त किया और उसकी तुलना प्रयोगशाला में मापे गए एरिथ्रुलोज़ के घूर्णन-वर्णक्रम से की। 12 रेखा-समूहों में 17 संक्रमण पहचाने गए। इनमें से 6 समूह अन्य अणुओं की मिलावट से काफी हद तक मुक्त थे; सांख्यिकीय विश्लेषण के अनुसार सभी संकेतों के संयोगवश सही स्थान पर आने की संभावना लगभग 0.2% थी।
मापित उत्तेजन तापमान 11.3 ± 1.8 K था और आणविक हाइड्रोजन के सापेक्ष एरिथ्रुलोज़ की प्रचुरता लगभग (6.4 ± 0.6) × 10⁻¹⁰ थी। अधिक आश्चर्य की बात यह रही कि दल को उसी आणविक बादल में संरचना की दृष्टि से सरल तीन-कार्बन शर्कराएँ नहीं मिलीं। एरिथ्रुलोज़ की अनुमानित प्रचुरता उन शर्कराओं की प्रेक्षणीय ऊपरी सीमाओं से कम-से-कम 8 से 17 गुना अधिक थी। यह क्रम उस सहज धारणा से मेल नहीं खाता कि अणु केवल एक-एक कार्बन परमाणु जोड़ते हुए बड़े होते हैं।
ठंडी धूल भी जटिल शर्कराएँ बना सकती है
क्वांटम-रासायनिक गणनाएँ और खगोलरासायनिक सिमुलेशन बताते हैं कि ग्लाइकोलएल्डिहाइड और एथिलीन ग्लाइकोल जैसे सरल दो-कार्बन अणु लगभग 20 से 30 K तापमान पर अंतरतारकीय धूल की बर्फीली परतों में प्रतिक्रिया करके एरिथ्रुलोज़ बना सकते हैं। यानी शर्कराओं के बनने के लिए तारों, ग्रहों या जीवन के अस्तित्व की प्रतीक्षा जरूरी नहीं है। जिन आणविक बादलों से तारे और ग्रह बनते हैं, उनमें पहले से ही काफी जटिल अजैविक रसायन हो सकता है।
इसका जीवन की उत्पत्ति से क्या संबंध है?
एरिथ्रुलोज़ न तो जीवन है और न ही RNA में पाई जाने वाली शर्करा राइबोज़। फिर भी, पानी वाले वातावरण में कीटोज़ अपने समकक्ष एल्डोज़, जैसे थ्रियोस और एरिथ्रोस, में बदल सकते हैं; ये अभिक्रियाएँ शुरुआती न्यूक्लिक अम्लों के घटकों के निर्माण से जुड़े शोध के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। यदि शर्कराएँ या उनके पूर्वगामी पहले आणविक बादलों में बने और बाद में क्षुद्रग्रहों, धूमकेतुओं या अन्य छोटे पिंडों में शामिल हुए, तो युवा ग्रहों पर टक्करों के जरिए जीवन-पूर्व रसायन की कच्ची सामग्री उनकी सतह तक पहुँच सकती थी।
प्रेक्षित प्रचुरता, उल्कापिंडों में पानी की मात्रा और प्रारंभिक पृथ्वी तक पहुँचे कुल कार्बनिक पदार्थ के अनुमानों के आधार पर शोधपत्र का आकलन है कि लगभग 4.1 से 3.9 अरब वर्ष पहले उत्तरकालीन भीषण बमबारी के दौरान करीब 50 करोड़ से 5,000 करोड़ किलोग्राम एरिथ्रुलोज़ पृथ्वी तक पहुँची हो सकती है। हालांकि यह कई मान्यताओं पर निर्भर परिमाण-क्रम का अनुमान है, और उस बमबारी की तीव्रता व समय-सीमा दोनों पर अब भी बहस है। इसे प्रत्यक्ष माप नहीं समझना चाहिए।
वास्तविक उपलब्धि और अब भी अनुत्तरित प्रश्न
मुख्य परिणाम यह है कि चार कार्बन वाली एक जटिल, काइरल शर्करा अंतरतारकीय परिस्थितियों में अजैविक ढंग से बन सकती है और बनी रह सकती है। इससे वैज्ञानिकों को राइबोज़ जैसी RNA से अधिक सीधे जुड़ी शर्कराओं की खोज करने और अंतरतारकीय धूल पर होने वाली अभिक्रियाओं के जाल का पुनर्मूल्यांकन करने का मजबूत आधार मिलता है। फिलहाल सबसे सटीक निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मांड ग्रह बनने से पहले जीवन के कुछ रासायनिक घटक बना सकता है। उन घटकों से जीवन उत्पन्न होता है या नहीं, और कैसे होता है, यह एक अलग व अनुत्तरित प्रश्न है।